Wednesday, 9 June 2021

लोकतंत्र की हत्या

 राहुल गाँधी बार बार एक पागल की तरह लोकतंत्र की हत्या का बयान देता फिरता है.. आईए हम बताते हैं लोकतंत्र की हत्या क्या होती हैं..???,👇

      (लोकतंत्र की हत्या & न्यायालय का बलात्कार)


👉1973 में इंदिरा गाँधी ने न्यायमूर्ति A.N.Rey को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में बैठा दिया..,

वो भी तब जब उनसे वरिष्ठ न्यायधीशों की लिस्ट जैसे न्यायमूर्ति JM शेलात, KS हेगड़े और AN ग्रोवर सामने थी। अंततः हुआ यह कि नाराज़गी के रूप में इन तीनों न्यायधीशों ने इस्तीफा दे दिया..,🤔

     इसके बाद कांग्रेस ने पार्लियामेंट में जवाब दिया कि "यह सरकार का काम है कि किसे मुख्य न्यायधीश रखें और किसको नहीं और हम उसी को बिठाएंगे जो हमारी विचारधारा के साथ हो."

और आज वही लोग न्यायाधीशों की आज़ादी की बात करते हैं..?😡


 👉1975 में न्यायाधीश जगमोहन सिंहा को एक फैसला सुनाना था..,

      फैसला था राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी के चुनावी भ्रष्टाचार के मामले का...🤔

        जज साहब को फ़ोन आता है जिसमें कहा जाता है, 'अगर तुमने इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ फैसला सुनाया, तो अपनी पत्नी से कह देना इस साल करवा चौथ का व्रत न रखे'..🤔

     जिसका न्यायमूर्ति सिंहा ने आराम से जवाब देते हुए कहा कि 'किस्मत से मेरी पत्नी का देहांत 2 महीने पहले ही हो चुका है.'

       इसके बाद न्यायमूर्ति सिंहा ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया जो आज भी मिसाल के रूप में जाना जाता है। इसने कांग्रेस सरकार की नीव हिला दी और इसी से बचने के लिए इंदिरा गाँधी और कांग्रेस द्वारा 'इमरजेंसी' जनता पर थोप दी गयी..., देश को नहीं, इंदिरा गाँधी को बचाना था।🤔😡


👉1976 में A.N. Rey ने इंदिरा गाँधी द्वारा खुद पर किये गए एहसान का बदला चुकाया..,

शिवकांत शुक्ला बनाम ADM जबलपुर के केस में उनके द्वारा बैठाई गयी पीठ ने उनके सभी मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया। 

      उस पूरी पीठ में मात्र एक बहादुर न्यायाधीश थें जिनका नाम था न्यायमूर्ति HR खन्ना जिन्होंने अपने साथी मुख्य न्यायधीश को कहा कि 'क्या आप खुद को आईने में आँख मिलाकर देख सकते हैं???' 🤔

            इस पीठ में न्यायाधीश AN Rey, HR खन्ना, MH बेग, YV चंद्रचूड़, PN भगवती शामिल थे।

बाद में यह सब मुख्य न्यायाधीशों की लिस्ट में आये सिर्फ एक न्यायधीश को छोड़ के जिनका नाम था न्यायधीश HR खन्ना जी।

           HR खन्ना जी को इंदिरा गाँधी की सरकार ने दण्डित किया और अनुभव तथा वरिष्ठता में उनसे नीचे बैठे न्यायधीश MH बेग को देश का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।🤔😡


यह था भारत के लोकतंत्र का हाल कांग्रेस के राज में!🤔😳😡


यही न्यायाधीश MH बेग रिटायरमेंट के बाद नेशनल हेराल्ड के डायरेक्टर बना दिये गए। 

यह नेशनल हेराल्ड अखबार वही अखबार है जिसके घोटाले में आज सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ज़मानत पर छूटे हुए हैं।🙄

यह पूरी तरह से कांग्रेस का अखबार था और एक प्रकार से कांग्रेस के मुखपत्र की तरह काम करता था।

आश्चर्यजनक रूप से न्यायाधीश बेग ने अपॉइंटमेंट स्वीकार कर लिया।

         

 👉      राहुल गाँधी का 'संविधान को खतरा' वाले सवाल पर उनके मुँह पर यह जानकारियां मारी जानी चाहिए..?और उनसे पूछना चाहिए कि क्या इस प्रकार से ही बचाना चाहते हो लोकतंत्र को..??😡


बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि 


👉1980 में इंदिरा गाँधी सरकार में वापस आयी और इसी MH बेग को अल्पसंख्यक कमीशन का चैयरमैन नियुक्त कर दिया गया। वह इस पद पर 1988 तक रहे और उनको 'पद्म विभूषण' से राजीव गाँधी की सरकार द्वारा सम्मानित भी किया गया था।

     

 👉1962 में न्यायाधीश बेहरुल इस्लाम का एक और नया केस सामने आया जो आपको जानना अति आवश्यक है...🤔

   👉     श्रीमान बेहरुल इस्लाम कांग्रेस के राज्य सभा के MP थें 1962 के दौरान ही और उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था...,

और हार गए थे।

वो दोबारा 1968 में राज्य सभा के MP बनाये गए। कांग्रेस की ही तरफ से (सीधी सी बात है.) उन्होंने 1972 में राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया और उनको गुवाहाटी हाई कोर्ट का न्यायाधीश बना दिया गया।..🙄1980 में वो सेवानिवृत्त हो गए परंतु ,

        जब इंदिरा गाँधी 1980 में दोबारा वापस आयी तो इन्हीं श्रीमान इस्लाम को 'न्यायाधीश बेहरुल इस्लाम' की उपाधि वापस दी गयी और सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश बना दिया गया...🤔😡


👉गुवाहाटी हाई कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के 9 महीने बाद का यह मामला है भाई साहब!

 👉       इंदिरा गांधी पूरी तरह से यह चाहती थी कि सभी न्यायालयों पर उनका 'कंट्रोल' हो.उस समय इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी और कांग्रेस पर लगे आरोपों की सुनवाई विभिन्न न्यायालयों में हो रही थी. वो इंदिरा गाँधी के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुए और साफ तौर पर कांग्रेस के लिए भी...,

   👉    'न्यायाधीश' इस्लाम ने एक महीने बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया और फिर एक बार असम के बारपेटा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े.

        लोकतंत्र का इससे बड़ा मज़ाक क्या होगा? जिस चुनाव में वो खड़े होने वाले थे उस साल चुनाव नहीं हो पाए अतः उनको एकबार फिर से कांग्रेस की तरफ से राज्य सभा का MP बना दिया गया।

            

            लोकतंत्र के लिए जिस प्रकार से कांग्रेस आज छाती पीट रही है, उसी ने लोकतंत्र का गला सबसे ज़्यादा बार घोंटा है...!!

दुर्लभ ग्रंथ

अति दुर्लभ एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे

इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए ---

यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े

तो कृष्ण कथा के रूप में होती है ।

जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।

इस ग्रन्थ को

‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे

पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और

विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।

पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।"

उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थातः

मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो

जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

अब इस श्लोक का विलोमम्: इस प्रकार है

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थातः

मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के

चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ

विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

" राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।

रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।

पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥


विलोमम्:

वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।

राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।

सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥

विलोमम्:

भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।

कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।

नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥

विलोमम्:

यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।

तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।

तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

विलोमम्:

तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।

सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।

काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥

विलोमम्:

तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।

तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।

कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:

मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।

तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।

साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:

हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।

यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।

सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:

सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।

यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।

यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥

विलोमम्:

हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।

सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।

भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:

सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।

होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।

सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:

भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।

वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।

यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:

नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।

हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।

सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:

यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।

गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।

ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:

नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।

हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।

तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥

विलोमम्:

हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।

जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।

न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:

तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।

सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।

वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:

केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।

ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।

सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥


विलोमम्:

हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।

यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।

राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:

घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।

धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।

हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥

विलोमम्:

विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।

ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।

चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:

ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।

हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।

तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:

योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।

जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।

तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:

विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।

तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।

राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:

यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।

निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।

तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:

जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।

हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।

तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्

नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।

सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।

चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्

हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।

सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।

रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:

नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।

कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥

निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:

भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स

गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।।


कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि यह दुनिया में कहीं भी ऐसा न पाया जाने वाला ग्रंथ है ।

बाबा रामदेव

 बाबा रामदेव का तर्कहीन विरोध


आजकल बाबा versus एलोपैथी के विवाद का बहुत जोर है । बाबा रामदेव का काफ़ी लोग मज़ाक़ उड़ाते है, उनपर कटाक्ष भरे भाव में विनोद भी करते है, लेकिन क्या किसी ने आज तक यह सोचा है की भगवाधारी संत जिसने एक अलग सोच के साथ सोचकर पूरा Paradigm Shift कर दिया और एक कल्पना को Innovation में परिवर्तित कर अपने उदेश्य और लक्ष्य दोनो को प्राप्त किया औऱ कर रहा है ।


आज से लगभग 35 साल पहले युवा बाबा जी आर्यसमाज के जलसों के स्थलों पर हरिद्वार व निकटवर्ती क्षेत्रो में अपनी bicycle जिसमे पीछे दोनों तरफ डब्बे भी लगे होते थे परझोले लटकाकर पर घूम घूम कर स्वयं की बनाई हुई आयुर्वेद की दवाइयां बेचा करते थे और आज दिव्य फार्मेसी व पतंजलि का व्यवसाय 26,000 करोड़ का हो चुका है । 


क्या यह चमत्कृत कर देने वाली सफ़लता नहीं है । मैनेजमेंट के छात्रों के लिए तो यह एक स्टडी केस है ।


ये जितने भी अंग्रेज़ी के शब्दों का यहा पर उल्लेख किया गया है, ये वो सारे शब्द है जो मैनेजमेंट की पढ़ाई में सिखाए जाते है लेकिन जो सिखते है वे केवल और केवल पावरपाईंट में ही इसको देखते हैं बाबाजी ने कर के दिखाया !


क्या हमने कभी सोचा है की इतना ज्ञान लेकर और फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलकर भी हम एक चने का पैकेट भी अपने नाम से बेचने की क्षमता रखते है ?


लोग कहते हैं की आयुर्वेद तो हजारों वर्ष से है किन्तु यह भूल जाते हैं की बाबाजी के आने से पहले कितने लोगों को भस्तिका, कपाल भाती, अनुलोम विलोम, भ्रामरी, मंडूक आसन, सर्वांगासन इत्यादि याद रह गए थे । बाबाजी ने इनको जन जन तक पहुंचाया और विस्म्रत होते जा रहे  आयुर्वेद को frontline में लाकर विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में खड़ा कर दिया । उस व्यक्ति ने केवल गुरुकुल के ज्ञान के आधार पर इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा किया की आज तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनिया सदमे में है ! 


कुछ लोग कहते हैं ये बाबा नही उद्योगपति हैं मुनाफा कमा रहे हैं ।  चलिए मान लिया । क्या कोलगेट, allembic, प्रोक्टर & गैम्बल, रिचर्डसन हिन्दुस्तान, हिंदुस्तान लीवर, ranbaxy, मैनकाइंड इत्यादि कंपनियां चैरिटी कर रही हैं ? देश का पैसा बाहर भेजने के अतिरिक्त उन्होंने क्या किया ? क्या देश के विकास में उनका क्या योगदान है ? बाबाजी करोड़ों की चैरिटी करते हैं और देश का पैसा देश में ही रहता है । पतंजलि के उत्पाद भी गुणवत्ता से भरपूर है ! इस व्यक्ति ने हमें "Made in India" की जगह "Made In Bharat" लिखना सिखाया । अब यदि एलोपैथिक डॉक्टर किसी व्यक्ति के भीतर लाखों की दवाइयां ठूस कर मोटा माल काटने की सोचें औऱ बाबाजी उसको थोड़े से खर्चे में प्राणायाम,काढ़े और बिना साइड इफ़ेक्ट वाली आयुर्वेद दवाइयों से ठीक कर दें तो तिलमिलाहट तो होगी ही । जरा सोचिए 80,000 तक के रेमेडिसेवेर इंजेक्शन लोगों ने घर बार बेचकर, माताओं बहनों ने अपने गहने बेचकर खरीदे और ये एलोपैथी वाले बाबाजी की 600 की कोरोनिल पर सवाल करते हैं चूंकि इस के पूर्व प्रयोग से रेमेडिसेवेर की ज्यादातर जरूरत ही पड़ती । अब जलन तो होगी ही । कितना बड़ा षड्यंत्र है ये ।


बाबाजी का विरोध इसीलिए भी हो रहा है की कहीँ न कहीं बाबा जी की पतंजली के जरिये हिंदुत्व का ध्वज स्वतः ही ऊंचाइयों पर जा रहा है । कथित सेक्युलर लिब्रन्दू और वामपंथी  इसमें सबसे आगे हैं । गौमूत्र चिकित्सा का विरोध करने वाली लॉबी भी इसमें आगे है बिना ये सोचे की खाड़ी के देशों में ऊंट का मूत्र पिया जाता है और पैक्ड मिलता है ।


ऊपर से बाबाजी ने IMA के छत्ते में हाथ डाल दिया । IMA की सत्यता उजागर करके बाबा जी ने हम सबपर उपकार ही किया वरना सब इसके घ्रणित स्वरूप के बारे में कहा जानते थे । पहली बार पता चला की IMA कोई सरकारी संस्था नहीं बल्कि मात्र एक NGO है ईसाई लॉबी द्वारा पल्लवित व पुष्पित गई जिसका प्रमुख भी एक ईसाई है । यह कोई अधिकृत संस्था नहीं है । बाबा जी ने इस ततैयों के छत्ते में पत्थर मार दिया । 


आज पतंजलि के उत्पाद व  दवाइयां अच्छी गुणवत्ता भी देती हैं और दूसरे प्रतिस्पर्धी से सस्ती भी हैं । लेकिन समझ से बाहर की बात है की IMA से लड़ाई में डाबर,झंडू, बैद्यनाथ इत्यादि क्यों चुप हैं ये समझ से बाहर की बात है ।


मैं और मेरे जैसे करोड़ों लोग इस लड़ाई में आयुर्वेद व बाबा जी के साथ हैं ।